‘बाबू मोशॉय’ बनने की चाह लेकर फिल्मों में आए थे टॉम ऑल्टर…

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उन्हें उनके नाम से भले सभी न जानते हों, लेकिन ‘वो अंग्रेज एक्टर’ कहते ही सभी के जहन में एक ही चेहरा उभरता है, टॉम ऑल्टर का. चेहरा अंग्रेज और जुबान हिंदी-उर्दू में इतनी नजाकत से की सुनने वाले सुनते ही रह जाएं. वह भारतीय सिनेजगत में ऑफबीट कैरेक्टर्स के मेनस्ट्रीम एक्टर थे. लेकिन हम आपको यहां बताएंगे अंग्रेजी-स्कॉटिश वंश के अमेरिकी ईसाई मिशनरियों के पुत्र भारत में ही जन्मे और भारत की मिट्टी में पगे टॉम ऑल्टर के फिल्मों में आने के बारे में.

टॉम ऑल्टर अब इस दुनिया में नहीं रहे। वो 67 वर्ष के थे। 22 जून 1950 को मसूरी में पैदा हुए टॉम ऑल्टर के माता-पिता अमरीकी मूल के थे। टॉम देखने में बेशक विदेशी लगते थे लेकिन उनका दिल देसी था। बचपन से ही टॉम की दिलचस्पी खेलों में थी।

18 की उम्र में अमेरिका के येल यूनिवर्सिटी गए पढ़ने, लेकिन मन नहीं लगा. बीच में छोड़कर वापस चले आए. अगले कुछ वर्ष उनके भटकने के वर्ष रहे. कई नौकरियां कीं, कई शहरों में भटके. इसी दौरान हरियाणा के जगधरी में वह करीब छह महीने रहे, जहां वह सेंट थॉमस स्कूल में शिक्षक थे. इस दौरान उन्होंने जगधरी में हिंदी फिल्में देखनी शुरू कीं. लेकिन बॉलीवुड के पहले सुपरस्टार राजेश खन्ना की फिल्म ‘आराधना’ ने 19 वर्ष के टॉम ऑल्टर को इतना प्रभावित किया कि उसी सप्ताह उन्होंने इस फिल्म को तीन बार देख डाला. अगले दो साल तक उनके जहन में राजेश खन्ना और शर्मिला टैगोर चलती रहीं. अब बस वह राजेश खन्ना बनना चाहते थे.

टॉम को हिंदी फिल्में देखने का बड़ा ही शौक था। एक बार अपने किसी दोस्त के साथ टॉम फिल्म देखने गए थे। उस वक्त उन्होंने राजेश खन्ना का नाम नहीं सुना था लेकिन इस फिल्म में राजेश खन्ना की एक्टिंग ने टॉम को एक्टिंग के लिए प्रेरित किया और उन्होंने पुणे के एफटीआईआई में एडमिशन लिया।

यहां दाखिला लेने के बाद टॉम को फिल्मी दुनिया की असली पहचान हुई। उन्हें इस बात का एहसास हुआ कि एक्टिंग करना कोई दाएं हाथ का खेल नहीं है लेकिन टॉम को खुद पर भरोसा था।

साल 1976 में फ़िल्म ‘चरस’ के साथ अपने फिल्मी करियर की शुरुआत की और उसके बाद शतरंज के खिलाड़ी, देश-परदेश, क्रांति, गांधी, राम तेरी गंगा मैली, कर्मा, सलीम लंगड़े पे मत रो, परिंदा, आशिकी, जुनून, परिंदा, वीर-जारा, मंगल पांडे जैसी फिल्मों में निभाए किरदारों ने उन्हें हिंदी सिनेमा का स्थायी अभिनेता बना दिया।

टॉम ने जिंदगी में जो चाहा उन्हें वो सब मिला ये बात उन्होंने एक इंटरव्यू के दौरान बताई। उन्होंने कहा आदमी को जिंदगी से और क्या चाहिए? मैंने राजेश खन्ना के साथ एक्टिंग की, सुनील गावस्कर के साथ क्रिकेट खेला, शर्मिला टैगोर के साथ अभिनय किया, पटौदी साहब, मिल्खा सिंह से मिला, दिलीप कुमार, देव आनंद, राजकपूर के साथ काम करने मुझे का मौका मिला। ये जो जवानी के सारे सपने थे, वे पूरे हुए।

टॉम के कुछ ऐसे सपने भी थे जो जिंदगी के आखिरी सफर में अधूरे रह गए। टॉम अपने जीवन में एक बार नेहरू और जिन्ना का किरदार अदा करना चाहते थे। टॉम को दोनों का किरदार काफी आकर्षक लगता था। इसके अलावा टॉम के दो सपने और थे एक तो बॉब डिलन साहब से मिलने का और दूसरा बीटल्स (चार ग्रीको स्टार) से मिलने का लेकिन टॉम की ये तमन्ना अधूरी रह गई।

टॉम चाहते थे मरने से पहले उनकी ये दो इच्छाएं पूरी हो जाए लेकिन उनके निधन के साथ ही उनकी ये तमन्ना उनके साथ चली गई। टॉम आज भले ही हमारे बीच ना हो लेकिन अपने अभिनय और अंदाज के दम पर वो हमेशा ही सिनेप्रमियों के दिल पर राज करते रहेंगे।