देश के लिए काम करने वाले डॉग्स को रिटायरमेंट के बाद मार डालती है सेना, जानिए क्या है कारण

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देश की सुरक्षा में देश के जवान जितना योगदान देते है अक्सर वैसा ही योगदान कुत्तो के द्वारा भी देखने को मिलता है. सुरक्षा के मामलो में अक्सर कुत्तो का इस्तेमाल किया जाता है. ये कुत्ते बम, बारूद और आतंकियों के ठिकानों का पता लगाने में भी आर्मी की मदद करते हैं। कुत्तों की इसी वफादारी की वजह से ही उन्हें इंसान का सच्चा दोस्त कहा जाता है। एक बार आपका दोस्त आपकी मदद के लिए अपने पैर पीछे कर सकता है मगर आपका कुत्ता नहीं।

ये देश के अहम प्रहरी जब अपनी सेवा से रिटायर होते है  तो आर्मी के द्वारा उसे मौत की नींद सुला दिया जाता है। आखिर ऐसा क्यों होता है? कुत्तों का आर्मी में क्या योगदान होता है? आइये जानते है इन सभी सवालो के जवाब.

इंडियन आर्मी में तीन नस्ल के कुत्तों को शामिल किया जाता है। इनमें लेब्राडोर, जर्मन शेफर्ड और बेल्जियन शेफर्ड शामिल होते हैं। आर्मी में शामिल होने वाले कुत्तों का खाने-पीने से लेकर सुरक्षा तक का पूरा ख्याल रखा जाता है। इन्हें प्रशिक्षण भी दिया जाता है। ये हमेशा किसी आर्मी ऑफिसर की तरह अलर्ट रहते हैं। लेकिन जब कोई आर्मी का कुत्ता एक महीने से अधिक समय तक बीमार रहता है या ड्यूटी नहीं कर पाता है तो उसे एनिमल यूथेनेशिया नाम का जहर देकर मार दिया जाता है।

रिटायरमेंट के बाद कुत्तो को मरने का यह चलन नया नही है. सेना में रिटायरमेंट के बाद कुत्तों को मार देने का चलन काफी पुराना है। ये उस समय से चला आ रहा है जब अंग्रेज, भारत पर राज किया करते थे।रिटायरमेन्ट के बाद कुत्तों को मारने की पहली वजह ये होती है कि कुत्तों को आर्मी के बेस लोकेशन्स की पूरी जानकारी होने के साथ-साथ कई सीक्रेट्स भी पता होते हैं। ऐसे कुत्तों को किसी आम आदमी के पास सौंप देना सुरक्षा के लिहाज से आर्मी के लिए एक बड़ा खतरा हो सकता है। इसलिए आर्मी किसी भी तरह का जोखिम नही उठाना चाहती.

कुत्तो को मरे जाने की एक वजह और भी है. दरअसल कुत्तों को आर्मी में विशेष सुविधाएं दी जाती हैं, जिनकी उनको आदत लग जाती है। आर्मी की तरह कुत्तों को सुविधाएं दे पाना किसी इंसान या वेलफेयर सोसाइटी के लिए मुश्किल हो सकता है। एक कारण यह भी है कि सेना, उन्हें किसी और के पास नहीं भेजना चाहती।