पिता की अंतिम यात्रा में शामिल होने के लिए 2 रुपये भी नहीं थे, फिर माँ ने चूड़ी बेचकर बना दिया बेटा को IAS!

दोस्तों जिनमे अपने लक्ष्य को हासिल करने का ज़ज़्बा होता है वो हर परिस्थिति से लड़कर अपना लक्ष्य हासिल करते हैं। ऐसी ही एक संघर्ष भरी कहानी हैं झारखण्ड कैडर के आईएएस अधिकारी रमेश घोलप की। जिन्हे इस वक्त राज्य सरकार ने झारखंड राज्य कृषि विपणन पार्षद, रांची के प्रबंध निदेशक पद पर पदस्थापित किया है साथ ही अगले आदेश तक झारखंड राज्य सहकारी बैंक लिमिटेड, रांची के प्रशासक का अतिरिक्त प्रभार सौंपा है। बचपन में कभी मां के साथ सड़क पर चूड़ी बेचने वाले रमेश आज आईएएस अफसर है। कठिन परिस्थितियों में इस मुकाम को हासिल करने वाले रमेश की कहानी बेहद संघर्ष से भरी रही है। रमेश घोलप का जन्म महाराष्ट्र के सोलापुर में हुआ। जिंदगी बदलने का सही ढंग कोई इनसे सीखे। एक ऐसा भी समय था जब इन्होंने अपनी मां के साथ चूड़ियां बेचीं थी। महाराष्ट्र के सोलापुर जिले के वारसी तहसील के महागांव में जन्मे रमेश ने जब होश संभाला तो पाया कि परिवार दो समय की रोजी के लिए भी जंग लड़ रहा है।

रमेश के पिता एक साइकिल रिपेयरिंग की दुकान चलाते थे। इस दुकान में रमेश के परिवार की रोटी चल सकती थी। जिस उम्र में बच्चे खेलते हैं उस समय में रमेश ने संघर्ष शुरू कर दिया। उन्होंने कभी भी हार नहीं मानी। कभी अपनी आर्थिक स्थिति का रोना नहीं रोया। रमेश घोलप की सफलता की कहानी हर किसी के लिए प्रेरणा से कम नहीं है। गरीबी के दिन काटने वाले रमेश ने अपनी जिंदगी से कभी हार नहीं मानी और आज युवाओं के लिए वह एक मिसाल बन गए। गरीबी से लड़कर आईएस बने रमेश ने पिछले साल बतौर एसडीओ बेरमो में प्रशिक्षण प्राप्त किया। इन्होंने अभाव के बीच आईएएस बनने का ना सिर्फ सपना देखा बल्कि इसे अपनी मेहनत से सच कर दिखाया।

रमेश घोलप ने अपनी पढ़ाई को हमेशा जारी रखा था। उन्होंने खुद को मजबूत बना लिया था। परिवार की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी इसलिए बचपन में मां के साथ दिनभर चूड़ी बेचते थे। रमेश घोलप मौसी के इंदिरा आवास में ही रहते थे। बोर्ड परीक्षा से 1 माह पूर्व पिता जी का देहांत हो गया। पिताजी के गुजर जाने के बाद वह पूरी तरह टूट गए थे। विकट परिस्थिति में परीक्षा दी और अच्छे अंक हासिल किए। उनकी मां को सामूहिक योजना के तहत गाय खरीदने के नाम पर लोन मिल गया। इस लोन के पैसे से उन्होंने पढ़ाई जारी रखी। फिर इस पैसे को लेकर वह तहसीलदार की पढ़ाई करने लगे। बाद में इसी पैसों से आईएएस की पढ़ाई की। तंगहाली में जी रहे रमेश घोलप ने दीवारों पर नेताओं की घोषणाओं लिखने का काम किया, दुकानों का प्रचार किया, शादी की पेंटिंग की और पढ़ाई के लिए पैसे इकट्ठा किया।

रमेश के जीवन में परेशानी इसलिए भी अधिक थी क्योंकि बहुत ही कम उम्र में उनके बाएं पैर में पोलियो हो गया था। पैसे की कमी को विकलांगता का साथ भी मिल गया था। पर कहते हैं ना कि किस्मत उनकी भी होती है जिनके हाथ नहीं होते। उनके कदम रुकने वाले नहीं थे। उन्होंने कभी अपनी कमजोरी सामने नहीं आने दी। हर परिस्थिति से डटकर मुकाबला करते रहे थे। हमेशा तकलीफ के बाद भी मुस्कुरा कर आगे बढ़े। रमेश ने अपनी इस कमजोरी को भी अपनी सफलता के रास्ते में आने नहीं दिया। रमेश के पिता गोरख की साइकिल पंचर की दुकान थे दुकान में ऐसे ही कमाई खास नहीं होते थे। दो वक्त की रोटी भी नसीब नहीं होती थी। रमेश के गांव में पढ़ाई की कोई खास व्यवस्था नहीं थी गांव में शिक्षा के संसाधनों की कमी थी। इसलिए वह अपने चाचा के पास बरसी में पढ़ रहे थे। उस समय बरसी में उनके गांव का किराया मात्र 7 रुपये था। विकलांग होने की वजह से रमेश को केवल 2 रुपये देना पड़ता था। लेकिन रमेश के पास उस समय 2 भी नहीं थी। पड़ोसियों ने पैसे दिए थे तब जाकर वह अपने  पिता के अंतिम यात्रा में शामिल हो पाए थे।

पिता के देहांत के बाद पेट पालने की जिम्मेदारी बढ़ गई थी। मां ने परिवार पालने की जिम्मेदारी खुद उठाई। ऐसे में रमेश की मां सड़क किनारे चूड़ियां बेचकर गुजारा करने लगी। रमेश ने भी मां के काम में साथ दिया और उन्होंने भी चूड़ियां बेची। लेकर उन्होंने पढ़ाई पूरी से कभी दूरी नहीं बनाई। रमेश घोलप की कहानी से हमें प्रेरणा मिलती है कि जो भी सपना देखो उसके पीछे पड़ जाओ। कभी भी परिस्थिति का रोना मत रो। हर पल मुस्कुरा कर आगे बढ़ते चलो। जिसे सच में कुछ बड़ा हासिल करना होता है वह रास्ते में आने वाली किसी परेशानी को नहीं देखता बस अपने लक्ष्य के प्रति समर्पित रहता है। वरना रमेश का पूरा जीवन ही ऐसी दुखद घटनाओं से भरा पड़ा है। अगर वे उन परेशानियों को देखते तो शायद आज वह डीसी नहीं होते।

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